टुडे भास्कर
फरीदाबाद| सतयुग दर्शन वसुन्धरा, गाँव भूपानी, फरीदाबाद, के प्रांगण में, रामनवमी-यज्ञ, वार्षिक-महोत्सव के अवसर पर हर्षोल्लास के साथ विशाल शोभायात्रा आयोजित की गई। इस अभूतभूर्व शोभा-यात्रा में आगे-आगे सतवस्तु के कुदरती ग्रन्थ जिसमें आने वाले युग यानि सतयुग के संविधान का विस्तृत वर्णन है, की सवारी रही। मार्ग के दोनों ओर श्रद्धा और विश्वास को प्रकट करता बैंड, पीछे-पीछे अपने हार्दिक उद्गारों को नृत्य-शैलियों के द्वारा व्यक्त करते सुसज्जित बाल कलाकारों तथा प्रसन्नमुद्रा में श्वेत वस्त्र धारण किए हुए और गुलानारी दुपट्टा ओढ़े हुए हजारों श्रद्धालुओं की लम्बी कतारें चल रही थीं। पूरे वसुन्धरा प्रांगण की शोभा दर्शनीय थी। सम्पूर्ण वातावरण आनंद और हर्षोल्लास से पूर्ण था। इसी आनंदमय वातावरण में शोभा-यात्रा जैसे ही समभाव-समदृष्टि के स्कूल ‘ध्यान-कक्ष’’ में पहुँची तो वैसे ही ट्रस्ट के मार्गदर्शक श्री सजन जी ने इनक्रेडिबल इंडिया तथा हरियाणा टूरिज्म में सम्मिलित समभाव समदृष्टि के स्कूल, ध्यान कक्ष का परिचय देते हुए बताया कि यह स्कूल केवल एक शैक्षणिक परिसर का अंग मात्र नहीं, अपितु यह आध्यात्मिक चेतना, मानसिक परिष्कार एवं आंतरिक उत्कर्ष का दिव्य केंद्र है। यह पावन साधना-स्थल शिक्षार्थियों के अंतर्मन में समत्व, समदर्शिता तथा सार्वभौमिक दृष्टिकोण का बीजारोपण करता है। यहाँ का वातावरण शांत, सात्विक एवं आध्यात्मिक स्पंदनों से परिपूर्ण है, जो साधक के चित्त को चंचलता से मुक्त कर आत्मानुभूति की ओर उन्मुख करता है।
शब्दकोश के अनुसार महिमा का अर्थ बताते हुए कहा गया कि ‘महिमा’ किसी वस्तु, स्थान, व्यक्ति या संस्था के विशिष्ट गौरव, श्रेष्ठता और दिव्यता का प्रतीक है। यह उस गुण या प्रभाव को इंगित करता है जिससे वह अन्य सभी से भिन्न, प्रशंसनीय और पूजनीय हो।
इस संदर्भ में ध्यान कक्ष की महिमा इस तथ्य में निहित है कि यह केवल मौन-आसन का स्थान नहीं, बल्कि आत्ममंथन, आत्मावलोकन और आत्मपरिष्कार का दिव्य प्रांगण है। यहाँ विद्यार्थी क्षणिक आकर्षणों एवं बाह्य विकर्षणों से निवृत्त होकर अपने अंतःकरण की गहराइयों में अवगाहन करते हैं। इस प्रक्रिया से उनमें सम, संतोष, धैर्य, करुणा, संयम, सहिष्णुता तथा विवेकशीलता का विकास होता है। ध्यान-साधना के माध्यम से मन की चंचल वृत्तियाँ शांत होकर स्थिरता को प्राप्त करती हैं, जिससे जीवन के विविध आयामों में संतुलन एवं समन्वय स्थापित होता है। यहाँ यह भी बताया गया कि ऐसा कमाल होने पर जैसे ही इंसान को अपनी अजरता व अमरता का बोध होता है, तो वह सहज ही कह उठता है-

“अमर है मेरी आत्मा
न जन्म में है
न मरन में है
न रोग में है
न सोग में है
न ख़ुशी में है
न ग़मी में है
न मान में है
न अपमान में है
न अमीरी में है
न ग़रीबी में है
वह अमीरों का भी अमीर है।”
आगे उन्होंने महत्ता का अर्थ बताते हुए कहा कि ‘महत्ता’ किसी विषय, क्रिया या संस्था की सामाजिक, नैतिक, शैक्षणिक या आध्यात्मिक दृष्टि से प्रधानता, प्रयोजन और आवश्यक भूमिका कहलाती है।
इसी संदर्भ में ध्यान कक्ष की महत्ता आधुनिक युग की आपाधापी, प्रतिस्पर्धा और मानसिक तनाव के संदर्भ में और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। वर्तमान भौतिकतावादी परिवेश में जहाँ व्यक्तित्व विखंडित होने की प्रवृत्ति प्रबल होती जा रही है, वहाँ यह ध्यान कक्ष आत्मिक एकत्व एवं मानसिक एकाग्रता का सुदृढ़ आधार प्रस्तुत करता है। यहाँ की पढ़ाई से विद्यार्थी न केवल शैक्षिक उत्कृष्टता की ओर अग्रसर होते हैं, बल्कि नैतिक दृढ़ता, मानवीय संवेदनशीलता एवं आध्यात्मिक परिपक्वता को भी आत्मसात करते हैं। परिणामतः उनके लिए आत्मज्ञान प्राप्त कर सत्य, धर्म के निष्काम रास्ते पर स्थिरता से बने रह परोपकार प्रवृत्ति, में ढलना सहज हो जाता है।
इसके अतिरिक्त महत्व का अर्थ स्पष्ट करते हुए उन्होंने बताया कि ‘महत्व’ किसी वस्तु, व्यक्ति या संस्था का जीवन, समाज या व्यक्तित्व पर पड़ने वाला दीर्घकालिक और स्थायी प्रभाव है।
ध्यान कक्ष का महत्व केवल व्यक्तिगत उत्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समरसता एवं वैश्विक बंधुत्व व वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को भी पुष्ट करता है। “समभाव” एवं “समदृष्टि” के सिद्धांतों का अभ्यास विद्यार्थियों को राग-द्वेष, भेदभाव, संकीर्णता आदि विकार वृत्तियों से ऊपर उठा समन्वित एवं व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करता है। इससे उनमें करुणा, उदारता, क्षमाशीलता तथा परस्पर सजन भाव विकसित होता है, जो एक सुसंस्कृत समाज के निर्माण की आधारशिला है।
इसी संदर्भ में आगे बताते हुए कहा कि समभाव – समदृष्टि का स्कूल “ध्यान कक्ष” चरित्र-निर्माण का प्रेरक केंद्र तथा जीवन-मूल्यों का अक्षय स्रोत है। इसकी महिमा अलौकिक, महत्ता अनुपमेय एवं महत्व अपरिमेय है। यह ध्यान कक्ष न केवल सत्य ज्ञान का आलोक प्रसारित करता है, अपितु आत्मोन्नति, आत्मसंयम और आत्मबोध की दिशा में कलयुगी भाव स्वभाव में उलझे हुए मानवों को निरंतर प्रेरित कर उनका व्यक्तित्व सतयुगी नैतिकता अनुसार समग्रता, संतुलन और सौम्यता से परिपूर्ण बनाता है। अंत में विश्व स्तर पर हर मानव को समभाव समदृष्टि के स्कूल की गतिविधियों के साथ जुड़ने का करबद्ध आवाहन दिया गया ताकि हर मन में नैतिकता का भाव उत्पन्न हो और हर मानव सज्जनता का प्रतीक बन इस मिथ्या जगत में निर्विकारिता से अपने निर्दिष्ट कर्तव्यों का निर्वहन करने में सफल हो सदा कर्म गति से मुक्त रहे। अंत में हर पथभ्रष्ट मानव से करबद्ध प्रार्थना करते हुए निवेदन किया गया कि सजन भाव अपनाओ व समभाव समदृष्टि होकर इस मिथ्या जगत से आज़ाद हो विश्राम को पाओ यानि ब्रह्म नाम कहाओ।



