औरत को था घूघँट पहनाया ।

औरत को था घूघँट पहनाया ।
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नारी प्रारब्ध से ही सबल  रही
केवल पुरुषों ने निर्बल बतलाया ।
समाजिक पटल पर उभरने की
खातिर
औरत को था घूघँट पहनाया ।
ये अहम् की गहरी चाल ही थी
जो हमको कोमल , कमजोर
जतलाया ।
मोहपाश में बँधकर हमनें भी
इसे सच मानकर अपनाया ।
जागृत हुई नारी शक्ति तो
सामाज के ठेकेदारों के चेहरे से
नकाब उठाया ।
उनका चेहरा आइने में उनको ही
देखो दिखलाया ।
झूठ को झूठ साबित करने को
अनगिनत अग्नि परीक्षाओं को
पार किया ।
नित नई लड़ाई लड़- लड़कर
अपनी काबिलियत का प्रचार
किया ।

कल्पना बन अंतरिक्ष में
जाने का साहस जुटाया था।
लक्ष्मी बन बांध पीठ पर लाल को अपने
अंग्रेजों के छक्के छुड़ाये थे ।
पद्मिनी बन जौहर दिखा
खिलज़ी की ताकत का उपहास
उड़ाया था।
मीरा बन कान्हा के लिये
महलों का सुख ठुकराया था।
भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा ने
पाकिस्तान का बैण्ड बजाया था ।

खेलों के क्षेत्र में देखो
नित नए  तगमें लाती हैं ।
ब्योपार हो या कला क्षेत्र
हर जगह स्थान बनाती हैं ।

आज महिला दिवस के अवसर पर
सबको ये कहना चाहती हूँ-
औरत होने पर गर्व है मुझे
बेटियाँ हैं अभिमान मेरा ।
नहीं दरकार मुझे बेटों की
वंश की बेल बढ़ाने को
बेटियाँ भी कुल दीपक हैं
दो घरों का जहां चमकाने को ।
बेटियाँ हैं सम्पत्ति हमारी
बुढ़ापा सुखी बनाने को।
हम नारी , हां नारी हैं
देश का , कुल का गौरव
बढ़ाने को ।
sharda mittal,
यह कविता कवियत्री शारदा मित्तल की है।

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