आध्यात्मिक स्थल की प्रमुख बनी, तो मिली रूढि़वादी सोच से आजादी

आध्यात्मिक स्थल की प्रमुख बनी, तो मिली रूढि़वादी सोच से आजादी
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नीलम बाटा रोड स्थित प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज केंद्र की प्रमुख बीके ऊषा दीदी।

-जिले में कई धर्म एवं आध्यात्मिक केंद्रों की प्रमुख हैं महिलाएं
यशवी गोयल
फरीदाबाद। आमतौर पर धर्म एवं आध्यात्मिक केंद्रों की प्रमुख महिलाएं कम ही देखने को मिलती हैं लेकिन फरीदाबाद में कई ऐसे केंद्रों की प्रमुख बनकर महिलाओं ने रूढि़वादी सोच से आजादी पाने की नजीर पेश की है। स्वतंत्रता दिवस से पूर्व आज उन महिलाओं के बारे में बात की जा रही है। जिन्होंने अपने बल पर आध्यात्मिक एवं केंद्रों की जिम्मेदारी ली और उसे वह बखूबी निभा रही है।
नीलम बाटा रोड स्थित प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज केंद्र की प्रमुख लुधियाना में जन्मी बीके ऊषा वर्ष 1964 में ईश्वरीय ज्ञान में आईं। उनके पिताजी पहले से ज्ञान में थे। उनकी 15-16 वर्ष की अवस्था में ही मां के गुजर जाने से छह बहनों और दो भाइयों जिम्मेदारी स्वीकार की। सभी जिम्मेदारियों को पूरी तरह से निभाया। एक जनवरी 1973 में फरीदाबाद आईं और उनके प्रयासों से वर्ष 2003 में नीलम बाटा रोड पर नया विशाल भवन मिला। आज 74 वर्ष की अवस्था में भी उनकी सक्रियता युवा बीके में शक्ति का संचार करता है। बीके ऊषा दीदी का कहना है कि कुछ असमाजिक तत्वों के कारण आधी आबादी को कर्म-कांड से अलग कर दिया गया है। जबकि हकीकत में देवता भी देवियों की पुजा करते हैं। उन्होंने बताया कि ब्रह्माकुमारीज केंद्र के संस्थापक ब्रह्मा बाबा ने कन्याओं के सिर पर ही ज्ञान का कलश रखा है। जब बाबा ने देवता विष्णु के चरणों में बैठी देवी लक्ष्मी का चित्र देखा तो उन्होंने तुरंत चित्रकार को दोनों को एक समान खड़े रहने का चित्र बनवाया और पूरे केंद्र में वहीं चित्र लगवाकर संदेश दिया को दोनों ही एक समान है। बाबा ने केंद्रों की जिम्मेदारी बहनों के कंधों पर सौंपी थी। जिसे वर्षों बीत जाने पर भी देश-विदेश की सभी बहनें बखूबी निभा रही है।

#सादगी के साथ रहना सीखा रही हैं सादा बाई
सैनिक कॉलोनी से गुडग़ांव की ओर ऊपर जाने वाले मार्ग पर सौ मीटर दाहिने स्थित श्रीकृष्ण परमधाम लोगों को विस्मयकारी लगता है लेकिन वहां अंदर ऐसा कुछ भी नहीं है जो व्यक्ति स्वीकार न कर सके। यहां की संस्थापिका सादा बाई (डॉ. सरोज साहनी) लोगों को वह सिखा रही हैं जो उन्हें उनके गुरु ने सिखाया यानि जीवन को शांति के साथ जीना, सादगी के साथ रहना और परमतत्व में मन रमाना। वह महाराष्ट्र में करीब 800 वर्ष पूर्व स्थापित महानुभाव पंथ अथवा जयकृष्ण पंथ की अनुयायी हैं। सादा बाई को वर्ष 1968 में मंत्र मिला और वर्ष 1997 में उन्होंने दीक्षा प्राप्त की। वह यहां गुडगांव रोड पर वर्ष 1995 में एक जमीन का टुकड़ा खरीद चुकी थीं इसलिए यहां दीक्षा के बाद उन्होंने परमधाम की स्थापना का काम आरंभ कर दिया। सादा बाई का कहना है कि सतयुग में नारी को देवी माना जाता था। जिसका प्रतीक देवी लक्ष्मी, देवी पार्वती व अन्य देवियां है। यह रूढ़ीवादी सोच का जन्म कलियुग में हुआ है। जिसके कारण महिलाओं की हालत बत्तर हुई है लेकिन महिलाओं को अपने अस्तित्व को बचाना चाहिए। उन्हें अन्य क्षेत्रों की तरह आधयात्मिकता में भी आगे आना चाहिए।

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श्रीकृष्ण परमधाम की संस्थापिका सादा बाई।

#त्रेतायुग तक था महिलाओं को अनुष्ठान करने का हक
श्री देवी गुरुधाम की संस्थापिका श्रीदेवी का कहना है कि त्रेतायुग में भी महिलाओं को पूजा-पाठ करने का पूरा हक था। जिसका उदाहरण सती अनसुईया है। जिन्हें पूजा-पाठ एवं अुनष्ठान करने की आजादी थी। कलियुग आते-आते महिलाओं की स्थिति गिरती चली गई। जिससे वह आज तक नहीं उभर पाई है लेकिन कुछ महिलाएं अपने बल पर समाज का नजरिया बदलने की कोशिश कर रही है। समाज के लोगों को भी महिलाओं के हक में आना चाहिए। क्योंकि महिला देवी का ही रूप है। जिसे वह लोग मंदिरों में देवी के रूप में भी पुजते हैं।
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श्री देवी गुरुधाम की संस्थापिका श्रीदेवी 

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